विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना तथा उधार देना) (प्रथम संशोधन) विनियम, 2026
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भारतीय रिज़र्व बैंक अधिसूचना सं. फेमा 3(आर)(5)/2026-आरबी 09 फरवरी 2026 विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना तथा उधार देना) (प्रथम संशोधन) विनियम, 2026 विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 47 की उप धारा (2), धारा 6 की उप धारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक एतद्द्वारा विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना तथा उधार देना) विनियम, 2018 (अधिसूचना संख्या फेमा 3(आर)/2018-आरबी दिनांक 17 दिसंबर 2018) में निम्नलिखित संशोधन करता है (इसके बाद 'प्रमुख विनियम' के रूप में संदर्भित), अर्थात्: 1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ – (1) ये विनियम विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार लेना तथा उधार देना) (प्रथम संशोधन) विनियम, 2026 कहलाएंगे। (2) ये सरकारी राजपत्र में उनके प्रकाशन की तारीख से लागू होंगे। (3) बाह्य वाणिज्यिक उधार, जिनके लिए इन विनियमों के लागू होने से पहले ऋण पंजीकरण संख्या प्राप्त की जा चुकी है, वे तत्कालीन लागू विनियमों के अनुपालन में जारी रहेंगे, सिवाय रिपोर्टिंग के, जो संशोधित नियमों के अनुसार की जाएगी। 2. विनियम 2 में संशोधन - प्रमुख विनियमों में, विनियम 2 को निम्नलिखित विनियमन द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:- "2. परिभाषाएँ - (1) इन विनियमों में, जब तक कि संदर्भ में अन्यथा आवश्यकता न हो: (ए) "अधिनियम" का अर्थ है विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (1999 का 42); (बी) "आर्मस लेंग्थआधार" का अर्थ है दो संबंधित पक्षों के बीच एक लेनदेन जो इस तरह से आयोजित किया जाता है जैसे कि लेन-देन करने वाले पक्ष असंबंधित थे, ताकि हितों का कोई टकराव न हो; (सी) "अधिकृत बैंक" का वही अर्थ होगा जो इसे विदेशी मुद्रा प्रबंधन (जमा) विनियम, 2016 में दिया गया है; (डी) "अधिकृत डीलर (एडी)" का अर्थ है अधिनियम की धारा 10 की उप-धारा (1) के तहत अधिकृत डीलर के रूप में प्राधिकृत व्यक्ति; (ई) "बेंचमार्क दर" का अर्थ है विदेशी मुद्रा (एफसीवाई) बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी)/व्यापार ऋण (टीसी) के मामले में उधार की मुद्रा पर लागू 6 महीने की अवधि की कोई भी व्यापक रूप से स्वीकृत अंतरबैंक दर या वैकल्पिक संदर्भ दर (एआरआर)। साथ ही, इसका अर्थ है कि भारतीय रुपये (आईएनआर) मूल्यवर्ग के ईसीबी/टीसी के मामले में तदनुरूपी परिपक्वता की भारत सरकार की प्रतिभूति का मौजूदा यील्ड। (एफ़) "नियंत्रण" - (i) कंपनियों के मामले में, नियंत्रण का वही अर्थ होगा जो कंपनी अधिनियम, 2013 में उसे दिया गया है; तथा (ii) एलएलपी के मामले में, नियंत्रण का अर्थ है नामित भागीदारों में से अधिकांश को नियुक्त करने का अधिकार, जहां ऐसे भागीदार, अन्य के लिए विशेष बहिष्करण के साथ, एलएलपी की सभी नीतियों पर नियंत्रण रखते हैं। (जी) "उधार लेने की लागत" का अर्थ है ब्याज की दर, अन्य शुल्क, व्यय, प्रभार, गारंटी शुल्क और निर्यात क्रेडिट एजेंसी प्रभार, चाहे इसका भुगतान एफसीवाई या आईएनआर में किया गया हो, लेकिन इसमें भारत में देय प्रतिबद्धता शुल्क और सांविधिक कर शामिल नहीं होंगे; (एच) "नामित अधिकृत डीलर (एडी) श्रेणी I बैंक" का अर्थ है ईसीबी और टीसी के संबंध में रिपोर्टिंग आवश्यकताओं को पूरा करने और ऐसे लेनदेन की निगरानी के लिए उधारकर्ता द्वारा नामित एडी श्रेणी I बैंक; (आई) "विनिमय अर्जकों का विदेशी मुद्रा (ईईएफसी) खाता" का वही अर्थ होगा जो उन्हें क्रमशः विदेशी मुद्रा प्रबंधन (भारत में निवासी व्यक्ति द्वारा विदेशी मुद्रा खाते) विनियम, 2015 में दिया गया है; (जे) "बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी)" का अर्थ, इन विनियमों की अनुसूची I के अनुसार, पात्र उधारकर्ता द्वारा मान्यता प्राप्त ऋणदाता से उधार लेना है; (के) "बाह्य वाणिज्यिक ऋण (ईसीएल)" का अर्थ, इन विनियमों की अनुसूची III के अनुसार, भारत में निवास करने वाले व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर निवास करने वाले व्यक्ति को उधार देना है; (एल) "विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) खाता (एफ़सीएनआर (बी)" का वही अर्थ होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंध (जमा) विनियमावली, 2016 में दिया गया है; (एम) "वित्तीय क्षेत्र विनियामक" का अर्थ, भारत में लागू किसी भी कानून के तहत स्थापित वित्तीय विनियामक निकाय है और इसमें भारतीय रिज़र्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण और पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण शामिल हैं; (एन) "विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (एफ़सीसीबी)" का वही अर्थ होगा जो इश्यू ऑफ फॉरेन करेंसी कन्वर्टिबल बॉन्ड्स एंड ऑर्डिनरी शेयर्स (थ्रू डिपॉजिटरी रिसीट मैकेनिज्म) स्कीम, 1993 में दिया गया है; (ओ) "विदेशी मुद्रा विनिमेय बॉन्ड (एफ़सीईबी)" का वही अर्थ होगा जो इश्यू ऑफ फॉरेन करेंसी एक्सचेंजेबल बॉन्ड्स स्कीम, 2008 में दिया गया है; (पी) "आवास वित्त संस्था" का वही अर्थ होगा जो राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) में दिया गया है; (क्यू) "भारतीय संस्था" का अर्थ है कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के तहत भारत में निगमित कंपनी या केंद्रीय/राज्य अधिनियम के तहत भारत में स्थापित कॉर्पोरेट निकाय या सीमित देयता भागीदारी अधिनियम, 2008 के तहत भारत में गठित और पंजीकृत सीमित देयता भागीदारी; (आर) "इंडस्ट्रियल पार्क" का अर्थ ऐसी परियोजना है जिसमें विकसित भूमि के प्लॉट या निर्मित स्थान या सामान्य सुविधाओं के साथ संयोजन के रूप में गुणवत्तापूर्ण ढाँचा विकसित किया जाता है और औद्योगिक गतिविधि के उद्देश्य से सभी आवंटित इकाइयों को उपलब्ध कराया जाता है; स्पष्टीकरण: साझा सुविधाओं का अर्थ इंडस्ट्रियल पार्क में स्थित सभी इकाइयों के लिए उपलब्ध सुविधाओं से है, और इसमें बिजली, सड़कें (पहुंचने वाली सड़कें भी शामिल हैं), रेलवे लाइन/साइडिंग जिसमें इलेक्ट्रिफाइड रेलवे लाइनें और मुख्य रेलवे लाइन से कनेक्टिविटी शामिल है, पानी की सप्लाई और सीवरेज, कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट, कॉमन टेस्टिंग, टेलीकॉम सेवाएं, एयर कंडीशनिंग, कॉमन फैसिलिटी बिल्डिंग, इंडस्ट्रियल कैंटीन, कन्वेंशन/कॉन्फ्रेंस हॉल, पार्किंग, ट्रैवल डेस्क, सुरक्षा सेवा, प्रथम उपचार केंद्र, एम्बुलेंस और अन्य सुरक्षा सेवा, प्रशिक्षण सुविधाएं और इंडस्ट्रियल पार्क में स्थित इकाइयों के साझा इस्तेमाल के लिए बनी ऐसी अन्य सुविधाएं शामिल हैं। (एस) “बुनियादी ढांचा क्षेत्र” का वही अर्थ होगा जो उसे भारत सरकार की समय-समय पर संशोधित अधिसूचना एफ़. सं. 13/06/2009-आईएनएफ़ के तहत स्वीकृत ‘इंफ्रास्ट्रक्चर सब-सेक्टर की हार्मोनाइज्ड मास्टर लिस्ट’ में दिया गया है। इन विनियामकीय उद्देश्यों के लिए, “एक्सप्लोरेशन, माइनिंग और रिफाइनरी’’ जैसे क्षेत्रों को बुनियादी ढांचा क्षेत्र माना जाएगा; (टी) “अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफ़एससी)” का वही अर्थ होगा जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाएं केंद्र प्राधिकार अधिनियम, 2019 (2019 का 50) में दिया गया है; (यू) ‘उदारीकृत विप्रेषण योजना’ का अर्थ 4 फरवरी, 2004 के परिपत्र ए.पी. (डीआईआर शृंखला) परिपत्र सं 64 के अनुसार बनाई गई योजना है; (वी) “अनिवासी बाहरी (एनआरई) खाता” का वही अर्थ होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंध (जमा) विनियमावली, 2016 में दिया गया है; (डबल्यू) “अनिवासी साधारण (एनआरओ) खाता” का वही अर्थ होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंध (जमा) विनियमावली, 2016 में दिया गया है; (एक्स) “राष्ट्रीय आवास बैंक” का वही अर्थ होगा राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) में दिया गया है; (वाय) “निवल मालियत” – (i) कंपनियों के मामले में, निवल मालियत का वही अर्थ होगा जो कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) में दिया गया है; तथा (ii) अन्य संस्थाओं के मामले में, निवल मालियत पूंजीगत और अवितरित लाभ के तहत तुलन पत्र में दर्ज धन का योग होगा, जिसमें से संचित हानि, आस्थगित व्यय और विविध व्यय के कुल मूल्य को घटाया जाएगा, जो अंतिम लेखापरीक्षित तुलन पत्र के अनुसार बट्टे खाते में नहीं डाला गया है। (ज़ेड) "अनिवासी भारतीय (एनआरआई)" का वही अर्थ होगा जैसा विदेशी मुद्रा प्रबंध (जमा) विनियम, 2016 में दिया गया है; (एए) "प्रवासी भारतीय नागरिक (ओसीआई) कार्डधारक" का वही अर्थ होगा जो नागरिकता अधिनियम, 1955 में दिया गया है; (एबी) "रियल इस्टेट व्यवसाय" का अर्थ लाभ अर्जित करने की दृष्टि से भूमि या अचल संपत्ति की खरीद, बिक्री या इसे पट्टे पर देना है और इसमें निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए भूमि या अचल संपत्ति की खरीद, बिक्री और पट्टा (हस्तांतरण न होना) शामिल नहीं है; (i) औद्योगिक पार्कों, एकीकृत टाउनशिप और एसईजेड का निर्माण और विकास; (ii) नई औद्योगिक परियोजनाओं का विकास, मौजूदा इकाइयों का आधुनिकीकरण और विस्तार; (iii) 'बुनियादी ढांचा क्षेत्र' के तहत कोई भी गतिविधि; (iv) निर्माण-विकास परियोजना; (v) उधारकर्ता के स्वयं के उपयोग के लिए वाणिज्यिक या आवासीय संपत्तियां; (vi) रियल इस्टेट ब्रोकिंग सेवाएं। स्पष्टीकरण:- (ए) निर्माण-विकास परियोजनाओं में टाउनशिप का विकास, आवासीय/वाणिज्यिक परिसरों का निर्माण, सड़कों या पुलों, होटलों, रिसॉर्ट्स, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, मनोरंजन सुविधाओं, शहर और क्षेत्रीय स्तर के बुनियादी ढांचे, टाउनशिप शामिल हैं; (बी) रियल इस्टेट व्यवसाय के संबंध में हस्तांतरण में ये शामिल हैं, - (i) संपत्ति की बिक्री, विनिमय या त्याग; या (ii) उसमें किसी भी अधिकार की समाप्ति; या (iii) किसी भी विधि के तहत उसका अनिवार्य अधिग्रहण; या (iv) संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 53ए में निर्दिष्ट प्रकृति के अनुबंध के आंशिक प्रदर्शन में किसी भी अचल संपत्ति के कब्जे की अनुमति देने या बनाए रखने की अनुमति देने वाला कोई भी लेनदेन; या (v) किसी कंपनी में पूंजीगत लिखत प्राप्त करके या किसी भी समझौते या किसी व्यवस्था के माध्यम से या किसी अन्य तरीके से कोई भी लेनदेन, जिसमें किसी भी अचल संपत्ति के अंतरण या उपयोग को सक्षम करने का प्रभाव होता है, शामिल हैं। (एसी) "संबंधित पक्ष" का अर्थ है ऐसी इकाई से है जो कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के प्रावधानों के अनुसार संबंधित पक्ष के रूप में अर्हता प्राप्त करती है। कंपनी के अलावा किसी व्यक्ति के लिए, यह परिभाषा आवश्यकतानुसार लागू होगी; (एडी) "रिश्तेदार" का वही अर्थ होगा जो कंपनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) में दिया गया है; (एई) "प्रतिभूति" का वही अर्थ होगा जो प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम, 1956 में दिया गया है; (एएफ) "विशेष आर्थिक जोन (एसईजेड)” का वही अर्थ होगा जो विशेष आर्थिक जोन अधिनियम 2005 में दिया गया है; (एजी) "विशेष अनिवासी रुपया खाता (एसएनआरआर) खाता" का वही अर्थ होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंध (जमा) विनियम, 2016 में दिया गया है; (एएच) “व्यापार ऋण (टीसी)” का मतलब है भारत में अनुमेय आयात के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ता या वित्तीय संस्थान द्वारा दिया गया ऋण और इसमें आपूर्तिकर्ताओं के ऋण और खरीदारों के ऋण दोनों शामिल हैं; स्पष्टीकरण: आपूर्तिकर्ताओं के ऋण का संबंध भारत में आयात के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं द्वारा दिए गए ऋण से है, जबकि खरीदारों के ऋण का मतलब भारत में आयात के भुगतान के लिए आयातक द्वारा किसी विदेशी बैंक या वित्तीय संस्थान से व्यवस्था किए गए ऋण से है। (एआई) “अंतरणीय विकास अधिकार” का वही मतलब होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंध (अनुमेय पूंजी खाता लेनदेन) विनियमावली, 2000 में इसे दिया गया है। (2) इन विनियमावली में उपयोग किए गए लेकिन परिभाषित नहीं किए गए शब्दों और अभिव्यक्तियों का अर्थ क्रमशः वही होगा जो उन्हें अधिनियम में दिया गया है।” 3. विनियम 3ए का शामिल किया जाना – मुख्य विनियमावली में, मौजूदा विनियम 3 के बाद, निम्नलिखित विनियम जोड़ा जाएगा, यानी:- “3ए. उधार ली गई निधि के अंतिम उपयोग पर प्रतिबंध:- (1) इन विनियमों के तहत उधार ली गई निधि भारत में इन कामों के लिए उपयोग नहीं की जाएगी:- (ए) चिट फंड; (बी) निधि कंपनी; (सी) रियल इस्टेट व्यवसाय और फार्महाउस का निर्माण, बशर्ते कि:- (i) निर्माण और विकास परियोजना के लिए ऋण लेने के मामले में, उधारकर्ता प्लॉट तभी बेचेगा जब वह ट्रंक अधोसंरचना अर्थात सड़कें, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइटिंग, जल निकासी और सीवरेज का विकास सुनिश्चित कर ले। (ii) औद्योगिक पार्क के लिए ऋण लेने के मामले में, ऐसे पार्क में कम से कम 10 यूनिट होनी चाहिए और कोई भी एक यूनिट आबंटन योग्य क्षेत्र के 50 प्रतिशत से ज़्यादा जगह नहीं घेरेगी और औद्योगिक गतिविधि के लिए आबंटित किए जाने वाले क्षेत्र का न्यूनतम प्रतिशत कुल आबंटन योग्य क्षेत्र के 66 प्रतिशत से कम नहीं होगा। स्पष्टीकरण: औद्योगिक पार्क में "आबंटन योग्य क्षेत्र" का मतलब है— (i) विकसित भूमि के प्लॉट के मामले में - इकाई को आबंटन के लिए उपलब्ध निवल साइट क्षेत्र, जिसमें सामान्य सुविधाओं के लिए क्षेत्र शामिल नहीं है। (ii) निर्मित स्थानों के मामले में - फर्श क्षेत्र और सामान्य सुविधाएं देने के लिए उपयोग किया गया बना हुआ स्थान। (iii) विकसित भूमि और निर्मित स्थान के संयोजन के मामले में – सामान्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए उपयोग किए जाने वाले साइट क्षेत्र और निर्मित स्थान को छोड़कर इकाइयों को आवंटन के लिए उपलब्ध निवल साइट और फर्श क्षेत्र। (डी) कृषि और पशुपालन, निम्नलिखित के आलावा – (i) नियंत्रित परिस्थितियों में फूलों की खेती, बागवानी और सब्जियों और मशरूम की खेती; (ii) बीज और रोपण सामग्री का विकास और उत्पादन; (iii) पशुपालन (कुत्तों की ब्रीडिंग सहित), मत्स्य पालन, जलीय कृषि और मधुमक्खी पालन; और (iv) कृषि और संबंधित क्षेत्रों से संबंधित सेवाएं स्पष्टीकरण:- 'नियंत्रित परिस्थितियों में' में फूलों की खेती, बागवानी, सब्जियों और मशरूम की खेती की श्रेणियों के लिए 'नियंत्रित परिस्थितियों में खेती' शामिल है जो कि खेती का एक तरीका है जिसमें बारिश, तापमान, सौर विकिरण, हवा की नमी और संवर्धन माध्यम को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जाता है। इन मापदंडों में नियंत्रण हरित घरों, नेट हाउस, पॉली हाउस या किसी अन्य उन्नत बुनियादी ढांचागत सुविधाओं के तहत संरक्षित खेती के माध्यम से किया जा सकता है जहां सूक्ष्म-जलवायु परिस्थितियों को मानवजनित रूप से विनियमित किया जाता है। (ई) चाय, कॉफी, रबर, इलायची, पाम तेल के पेड़, जैतून के तेल के पेड़ के अलावा अन्य बागान (एफ) अंतरणीय विकास अधिकारों (टीडीआर) में व्यापार; (जी) सूचीबद्ध / गैर-सूचीबद्ध प्रतिभूतियों में लेनदेन, सिवाय उन लेनदेन के जो किसी भारतीय संस्थान द्वारा कॉर्पोरेट कार्यों जैसे विलय, विलीनीकरण, समामेलन, व्यवस्था या नियंत्रण के अधिग्रहण के लिए किए गए हैं, जो कि उस अधिनियम जिसके तहत संस्था को निगमित / स्थापित किया गया है, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (शेयरों का पर्याप्त अर्जन और अधिग्रहण) विनियम, 2011, वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और प्रतिभूति हित अधिनियम, 2002 और दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016, जैसा लागू हो, के अनुसार किया जाए; स्पष्टीकरण: उप-विनियम 1(ग) के अंतर्गत, ऋण केवल रणनीतिक उद्देश्यों हेतु प्राप्त किया जाएगा, अर्थात् ऐसे उद्देश्य जो संभावित सहयोग (सिनर्जी) के माध्यम से दीर्घकालिक मूल्य सृजन के मुख्य उद्देश्य से प्रेरित हों, अल्पकालिक लाभों के लिए नहीं हो। (एच) घरेलू भारतीय रुपया ऋण की चुकौती (i) जो इस विनियमन के तहत प्रतिबंधित अंतिम उपयोग के लिए लिया गया था; या (ii) जो लागू प्रूडेंशियल मानदंडों के अनुसार गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। (आई) इस विनियम के अंतर्गत धन उधार लेने और उपयोग करने के लिए जिन उद्देश्यों की अनुमति नहीं है, उन उद्देश्यों के लिए कोई भी ऑन-लेंडिंग नहीं की जाएगी। 4. विनियम 6(बी) का संशोधन - मूल विनियमों के विनियम 6(बी) में, उप-विनियम (vi) को निम्नलिखित से प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:- “(vi) भारत में निवासी एकल व्यक्ति, एनआरआई या ओसीआई कार्डधारक रिश्तेदार से निम्नलिखित शर्तों के अधीन आईएनआर में भारत में प्रयोग के लिए उधार ले सकता है: (ए) ऋण की राशि या तो भारत के बाहर से आवक प्रेषण द्वारा या ऋणदाता के एनआरई / एनआरओ / एफसीएनआर (बी) / एसएनआरआर खाते में डेबिट करके प्राप्त की जानी चाहिए; और (बी) उधार गैर-प्रत्यावर्तन आधार पर होगा अर्थात ब्याज का भुगतान और मूलधन की चुकौती केवल ऋणदाता के एनआरओ खाते में की जाएगी।“ 5. मूल विनियमों में, अनुसूची 1 को निम्नलिखित से प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: “अनुसूची-I [विनियम 4(ए)(iv), 4(बी)(i), 4(बी)(iv), 6(ए), 6(बी)(i), 6(बी)(vii)] देखें] बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) फ्रेमवर्क 1. योग्य उधारकर्ता – (1) भारत में निवासी कोई भी व्यक्ति (एकल व्यक्ति के अलावा) जो किसी केंद्रीय या राज्य अधिनियम के तहत निगमित, स्थापित या पंजीकृत है, पात्र उधारकर्ता है, इस शर्त के अधीन कि ऐसे व्यक्ति को लागू अधिनियमों के अनुसार ईसीबी की अनुमति हो। (2) कोई भी पात्र उधारकर्ता, जो पुनर्गठन योजना या कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के अधीन है, केवल तभी ईसीबी जुटा सकता है जब पुनर्गठन या समाधान योजना के तहत विशेष रूप से अनुमति दी गई हो। (3) कोई पात्र उधारकर्ता जिसके विरुद्ध अधिनियम के अंतर्गत जारी किसी नियम, विनियम या निदेश के उल्लंघन के लिए किसी कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा कोई जांच, न्यायनिर्णयन या अपील लंबित है, लंबित जांच, न्यायनिर्णयन या अपील के बावजूद और ऐसी जांच, न्यायनिर्णयन या अपील के परिणाम पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ईसीबी जुटा सकता है। तथापि, उधारकर्ता को लंबित जांच, न्यायनिर्णयन या अपील के बारे में जानकारी 'फॉर्म ईसीबी 1' (या यदि कोई मौजूदा ईसीबी है तो 'संशोधित फॉर्म ईसीबी 1') के अंतर्गत देनी होगी। 2. मान्यता प्राप्त उधारदाता – एक पात्र उधारकर्ता निम्नलिखित से ईसीबी जुटा सकता है – (ए) भारत के बाहर रहने वाला व्यक्ति; (बी) ऐसी संस्था जिसका ऋण देने का व्यवसाय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित होता है उसकी भारत के बाहर स्थित शाखा; और (सी) आईएफएससी में स्थापित कोई वित्तीय संस्था या उसकी शाखा। स्पष्टीकरण: इस पैराग्राफ के प्रयोजन के लिए, वित्तीय संस्था का वही अर्थ होगा जो विदेशी मुद्रा प्रबंधन (अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाएं केंद्र) विनियमावली, 2015 के तहत इसे दिया गया है। 3. उधार की मुद्रा – (1) एक पात्र उधारकर्ता विदेशी मुद्रा (एफसीवाई) या भारतीय रुपये (आईएनआर) में मूल्यवर्गित ईसीबी जुटा सकता है। (2) ईसीबी की मुद्रा को एक विदेशी मुद्रा से दूसरी विदेशी मुद्रा में, किसी विदेशी मुद्रा से भारतीय रुपये में और भारतीय रुपये से किसी विदेशी मुद्रा में बदला जा सकता है। (3) मुद्रा परिवर्तन उस विनिमय दर पर होगा जो ऐसे परिवर्तन के लिए करार की तिथि पर प्रचलित है या ऐसी विनिमय दर पर होगा जिसके परिणामस्वरूप करार की तिथि पर प्रचलित विनिमय दर का उपयोग करके प्राप्त देयता से अधिक देयता नहीं होगी। 4. उधार लेने के प्रकार – (1) एक पात्र उधारकर्ता किसी भी प्रकार की वाणिज्यिक उधार व्यवस्था में ईसीबी जुटा सकता है जिसमें सहमत ब्याज का भुगतान, जिसे किसी भी नाम से बुलाया जाता है, और मूलधन की चुकौती शामिल हो। स्पष्टीकरण: ईसीबी में विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉण्ड (एफसीसीबी) और विदेशी मुद्रा विनिमेय बॉण्ड (एफसीईबी) जारी करके उधार लेना शामिल है। (2) भारत के बाहर रहने वाले किसी व्यक्ति से 30 अप्रैल 2007 को या उसके बाद प्राप्त निधि, जो अधिमान शेयरों या डिबेंचरों, जो पूरी तरह से और अनिवार्य रूप से इक्विटी शेयरों में परिवर्तनीय नहीं हैं, के निर्गमन के बदले में प्राप्त हुआ हो, उसे ईसीबी माना जाएगा। (3) पात्र उधारकर्ता द्वारा जुटाई गई निम्नलिखित निधियों को ईसीबी नहीं माना जाएगा: (ए) इन विनियमों के अनुसार जुटाया गया, तीन वर्ष तक की मूल परिपक्वता अवधि वाला व्यापारिक उधार; (बी) इन विनियमों तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन (माल और सेवाओं का निर्यात) विनियम, 2015 के अनुसार प्राप्त निर्यात अग्रिम; (सी) विदेशी मुद्रा प्रबंधन (ऋण लिखत) विनियमावली, 2019 के तहत प्राप्त निवेश; (डी) विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के तहत जारी संपरिवर्तनीय नोटों के माध्यम से प्राप्त निवेश; और (ई) विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के अनुसार ऋण लिखत के माध्यम से विदेशी उद्यम पूंजी निवेशक (एफवीसीआई) से प्राप्त निवेश। 5. उधार लेने की सीमा – (1) एक पात्र उधारकर्ता निम्नलिखित में से जो भी अधिक हो, उस सीमा तक ईसीबी जुटा सकता है: (ए) 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बकाया ईसीबी; या (बी) उधारकर्ता के अंतिम लेखापरीक्षित एकल तुलन-पत्र के अनुसार निवल मालियत के 300 प्रतिशत तक कुल बकाया उधार (बाह्य और घरेलू)। स्पष्टीकरण: बकाया उधार में गैर-निधि आधारित ऋण और अनिवार्य रूप से इक्विटी में परिवर्तनीय प्रतिभूतियों के निर्गमन के माध्यम से जुटाई गई निधियाँ शामिल नहीं होगी। (2) उधार सीमा के अनुपालन की जांच करते समय प्रस्तावित ईसीबी (पुनर्वित्त के लिए ईसीबी के अलावा) को भी सम्मिलित किया जाएगा। (3) उप-पैराग्राफ (1) में निर्दिष्ट उधार सीमा उन पात्र उधारकर्ताओं पर लागू नहीं होगी जो वित्तीय क्षेत्र के विनियामकों द्वारा विनियमित हैं। 6. परिपक्वता – (1) एक पात्र उधारकर्ता तीन वर्ष की न्यूनतम औसत परिपक्वता अवधि (एमएएमपी) के साथ ईसीबी जुटाएगा। स्पष्टीकरण: ईसीबी के लिए औसत परिपक्वता अवधि की गणना इन विनियमों के परिशिष्ट I में दर्शाए गए तरीके से की जाएगी। (2) विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत पात्र उधारकर्ता एक वर्ष और तीन वर्ष के बीच औसत परिपक्वता अवधि के साथ ईसीबी भी जुटा सकता है, इस शर्त के अधीन कि ऐसे ईसीबी की बकाया राशि 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक न हो। (3) कॉल और पुट ऑप्शन, यदि कोई हो, एमएएमपी के पूरा होने से पहले प्रयोक्तव्य नहीं होंगे। (4) उप-पैराग्राफ (1) और (2) में निर्दिष्ट एमएएमपी को निम्नलिखित मामलों में पूरा करना आवश्यक नहीं होगा – (ए) अधिनियम के तहत जारी नियमों और विनियमों के अनुसार ईसीबी (एफसीसीबी और एफसीईबी सहित) का गैर-ऋण लिखत में परिवर्तन; (बी) विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के तहत जारी गैर-ऋण लिखतों से प्राप्तियों का उपयोग करके ईसीबी का प्रत्यावर्तन आधार पर पुनर्भुगतान, इस शर्त के अधीन कि प्राप्तियां ईसीबी के आहरण के बाद हों; (सी) इन विनियमों के अनुसार ईसीबी के पुनर्वित्तपोषण; (डी) उधारदाता द्वारा कर्ज का अधित्याग; और (ई) अगर ईसीबी का पुनर्भुगतान उधारदाता या उधारकर्ता द्वारा कॉर्पोरेट कार्रवाइयां जैसे कि बंदी, विलय, विलगाव, व्यवस्था, नियंत्रण का अधिग्रहण, समामेलन, समाधान या परिसमापन के लिए आवश्यक हो। 7. उधार लेने की लागत – (1) उधार लेने की लागत प्रचलित बाजार स्थितियों के अनुरूप होगी। (2) तीन वर्षों से कम की औसत परिपक्वता अवधि वाले पात्र ईसीबी के मामले में, उधार लेने की लागत इस विनियमावली के तहत व्यापार ऋण के लिए विनिर्दिष्ट लागत सीमा के अनुपालन में होगी। निश्चित दर वाले ऋणों के मामले में, संबंधित स्वैप का फ्लोटिंग रेट तथा स्प्रेड, सीलिंग से ज़्यादा नहीं होगा। 8. अन्य लागत – प्रसंविदा के उल्लंघन या चूक के लिए लागू होने वाले चुकौती प्रभार या दंडात्मक ब्याज, यदि कोई हो, तो प्रचलित बाजार स्थितियों के अनुरूप होंगे। 9. स्वतंत्र संव्यवहार का सिद्धांत – संबंधित पक्ष से प्राप्त ईसीबी का कार्य निष्पक्ष स्वतंत्र संव्यवहार के सिद्धांत के आधार पर किया जाएगा। 10. ईसीबी राशि की प्राप्ति – (1) एक पात्र उधारकर्ता नामित एडी श्रेणी I बैंक के माध्यम से रिज़र्व बैंक से ऋण पंजीकरण संख्या (एलआरएन) लेने के बाद ही ईसीबी कि राशि प्राप्त कर सकेगा। (2) भारत में अनुमत आईएनआर व्यय के लिए उपयोग की जाने वाली ईसीबी निधियां, प्राप्ति तिथि से अगले महीने के अंत तक नामित एडी श्रेणी I बैंक में भारत में रखे गए आईएनआर खाते में जमा की जाए। उपयोग लंबित होने पर, निधियों को नामित एडी श्रेणी I बैंक में एक वर्ष तक की अवधि के लिए भार-रहित सावधि जमा में निवेश किया जा सकता है। (3) अनुमत विदेशी मुद्रा व्यय के लिए उपयोग की जाने वाली ईसीबी निधि को विदेशी मुद्रा प्रबंध (भारत में निवासी व्यक्ति द्वारा विदेशी मुद्रा खाते) विनियमावली, 2015 के अनुसार भारत में नामित एडी श्रेणी I बैंक में रखे गए एफसीवाई खाते में या भारत के बाहर रखे गए एफसीवाई खाते में जमा किया जाए। उपयोग लंबित होने पर, निधियों को भारत के बाहर एक वर्ष तक की अवधि के भार-रहित सावधि जमा में या एक वर्ष तक के मूल परिपक्वता वाले भार-रहित ऋण लिखत में निवेश किया जा सकता है। 11. जमानत – (1) ईसीबी को निम्नलिखित द्वारा जमानत किया जा सकता है – (ए) अनिवासी ऋणदाता या जमानत न्यासी के पक्ष में अचल संपत्तियों, मूर्त चल आस्तियां, वित्तीय आस्तियां और अमूर्त आस्तियां (बौद्धिक संपदा अधिकारों सहित) पर प्रभार सृजन करके; और (बी) विदेशी मुद्रा प्रबंध (गारंटी) विनियमावली, 2026 के अनुसार ऋणदाता या जमानत न्यासी के पक्ष में गारंटी जारी करके। (2) ईसीबी प्राप्त करना निम्नलिखित नियमों और शर्तों के अधीन होगा कि: (ए) उधार करार में एक खंड है जिसमें उधारकर्ता को ऐसी जमानत प्रदान करने की आवश्यकता होती है; (बी) किसी ऋणग्रस्त आस्ति पर प्रभार सृजित करने से पहले भारत में मौजूदा ऋणदाता (ऋणदाताओं) से, जैसा भी लागू हो, ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ प्राप्त किया जाएगा; और (सी) किसी परिसंपत्ति पर प्रभार का सृजन, पारदेशीय ऋणदाता/ जमानत न्यासी द्वारा भारत में आस्ति के अधिग्रहण करने की अनुमति के रूप में नहीं माना जाएगा। (3) भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित संस्थाएं किसी भी प्रकार की गारंटी प्रदान (जारी) नहीं करेंगी। (4) जमानत के प्रवर्तन/ सक्रियण की स्थिति में - (ए) ऋणदाता का दावा ईसीबी पर बकाया दावे तक ही सीमित रहेगा; (बी) किसी भी आस्ति / संपत्ति का अंतरण अधिनियम या उसके तहत जारी की गई नियमावली, विनियमावली या निदेशों के अनुपालन में होगा। भारत में मौजूदा ऋणदाता (ऋणदाताओं) (यदि कोई हो) से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' प्राप्त करने के बाद ऋणग्रस्त चल आस्तियों को देश से बाहर ले जाया जा सकता है; और (सी) जहां अधिनियम या नियमावली या विनियमावली या उसके तहत जारी किए गए निदेशों के तहत ऋणदाता द्वारा आस्ति / संपत्ति का अधिग्रहण अनुमत नहीं है वहां भारत में निवासी व्यक्ति को ऐसी संपत्ति के अंतरण से प्राप्त विक्रय आगम को ईसीबी के बकाया दावे को समाप्त करने के लिए ऋणदाता को प्रेषित किया जा सकता है। 12. पुनर्वित्तपोषण - पात्र उधारकर्ता मौजूदा ईसीबी को आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से नए ईसीबी द्वारा पुनर्वित्त कर सकता है, बशर्ते कि पुनर्वित्त के परिणामस्वरूप मूल उधार पर लागू एमएएमपी आवश्यकता को पूरा करने में विफल न हो (एकाधिक उधार के मामले में भारित बकाया परिपक्वता)। 13. ईसीबी का गैर-ऋण लिखत में संपरिवर्तन – (1) ईसीबी (जिनमें वे भी शामिल हैं जो परिपक्व हो चुके हैं लेकिन जिनका भुगतान नहीं हुआ है) को विदेशी मुद्रा प्रबंध (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के अनुपालन के अधीन गैर-ऋण लिखत में परिवर्तित किया जा सकता है। (2) ईसीबी का गैर-ऋण लिखत में परिवर्तन निम्नलिखित नियमों और शर्तों के अधीन होगा: (ए) इस प्रकार के संपरिवर्तन को सक्षम करने के लिए ऋणदाता को कोई अतिरिक्त लागत देय नहीं होगी; (बी) ऋणदाता की सहमति प्राप्त है; और (सी) अन्य ऋणदाताओं की सहमति, यदि कोई हो, उपलब्ध है या कम से कम संपरिवर्तन के संबंध में जानकारी अन्य ऋणदाताओं के साथ साझा की गई है। (3) प्रूडेंशियल विनियम, जिसमें पुनर्गठन से संबन्धित विनियम भी शामिल है, तब भी लागू होंगे जब उधारकर्ता ने रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित किसी इकाई (जिसमें उसकी विदेशी शाखा या सहायक कंपनी शामिल है) से ऋण सुविधाएँ प्राप्त की है। (4) गैर-ऋण लिखतों में परिवर्तन के लिए पात्र ईसीबी देयता का निर्धारण संबंधित पक्षों के बीच परिवर्तन के करार की तिथि पर प्रचलित विनिमय दर के आधार पर या ऐसी विनिमय दर पर किया जाएगा जिसके परिणामस्वरूप करार की तिथि पर प्रचलित विनिमय दर का उपयोग करके प्राप्त देयता से अधिक देयता न हो। 14. मानदण्ड, नियम और शर्तों में बदलाव – (1) ईसीबी को शासित करने वाले मापदंडों, नियमों और शर्तों में परिवर्तन ऋणदाता की सहमति और इस अनुसूची के प्रावधानों के अनुपालन के अधीन हैं। (2) उधार की अवधि के विस्तार की स्थिति में, यदि उधारकर्ता ने रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित किसी इकाई (जिसमें उसकी विदेशी शाखा या सहायक कंपनी शामिल है) से ऋण सुविधाएँ प्राप्त की हैं तब भी पुनर्गठन सहित प्रूडेंशियल विनियम लागू होंगे। (3) नामित एडी श्रेणी I बैंक का परिवर्तन मौजूदा नामित एडी श्रेणी I बैंक से ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ प्राप्त करने के अधीन होगा। 15. ऋण कि चुकौती – (1) ईसीबी फ्रेमवर्क के अनुपालन में किए गए ईसीबी के संबंध में मूलधन, ब्याज और अन्य प्रभार चुकाया जा सकता है। (2) ऋणदाता के एनआरओ खाते से प्राप्त ईसीबी के मामले में चुकौती केवल एनआरओ खाते में ही जमा किया जाए। 16. रिपोर्टिंग – (1) पात्र उधारकर्ता रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित प्रारूप में नामित एडी श्रेणी I बैंक के माध्यम से निम्नलिखित आवेदन/विवरणी प्रस्तुत करेंगे: (ए) ईसीबी का ब्यौरा प्रदान करने और एलआरएन प्राप्त करने के लिए 'फॉर्म ईसीबी 1'; (बी) ‘फॉर्म ईसीबी 1’ में पूर्व में रिपोर्ट किए गए ईसीबी मापदंडों में किसी भी परिवर्तन की रिपोर्टिंग के लिए ‘संशोधित फॉर्म ईसीबी 1’, उस महीने के अंत से सात कैलेंडर दिनों के भीतर जिसमें ऐसा परिवर्तन प्रभावी हुआ था; और स्पष्टीकरण: 'फॉर्म ईसीबी 1' में पहले रिपोर्ट की गई किसी भी अन्य जानकारी में बदलाव को सूचित करने के लिए 'संशोधित फॉर्म ईसीबी 1' भी प्रस्तुत किया जा सकता है। (सी) ईसीबी निधि प्राप्ति और ऋण चुकौती की रिपोर्टिंग के लिए 'फॉर्म ईसीबी 2', उस महीने के अंत से सात कैलेंडर दिनों के भीतर जिसमें nइदधि प्राप्ति या ऋण चुकौती की गई थी। स्पष्टीकरण: एलआरएन के तहत बकाया उधार में परिवर्तन करने वाली किसी भी घटना या लेनदेन की रिपोर्टिंग 'फॉर्म ईसीबी 2' में की जाएगी। (2) रिपोर्टिंग समय-सीमा का पालन न करने की स्थिति में, उधारकर्ता रिपोर्टिंग पूरी करने के बाद इस संबंध में रिज़र्व बैंक द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार विलंब प्रस्तुतीकरण शुल्क का भुगतान कर सकता है। (3) नामित एडी श्रेणी I बैंक पात्र उधारकर्ता से प्राप्त आवेदन/ विवरणी को उचित प्रमाणन के साथ रिज़र्व बैंक को इस उद्देश्य के लिए सूचित कि गई विधि और प्रारूप में प्रस्तुत करेगा। (4) यदि कोई पात्र उधारकर्ता 'फॉर्म ईसीबी 1'/'संशोधित फॉर्म ईसीबी 1' में अधिनियम के तहत जारी किसी भी नियम या विनियमन या निदेश के उल्लंघन के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा लंबित जांच या न्यायनिर्णयन या अपील की रिपोर्टिंग करता है तो नामित एडी श्रेणी I बैंक संबंधित एजेंसियों को उधार का पूरा ब्यौरा प्रदान करेगा। (5) नामित एडी श्रेणी I बैंक उधारकर्ता के अनुरोध पर आवंटित एलआरएन को रद्द करने के लिए रिज़र्व बैंक से संपर्क कर सकते हैं, बशर्ते कि कोई आहरण न हुआ हो। (6) सक्रिय एलआरएन वाले किसी भी उधारकर्ता को एक लापता उधारकर्ता के रूप में माना जाएगा – (ए) यदि उधारकर्ता अंतिम रिपोर्ट किए गए ‘फॉर्म ईसीबी 1’ के अनुसार आहरण या ऋण चुकौती कि जाने वाले तिमाही के बाद लगातार चार या अधिक तिमाहियों तक विनिर्दिष्ट विवरणी में से कोई भी प्रस्तुत करने में विफल रहता है; और (बी) नामित एडी श्रेणी I बैंक, चार तिमाहियों की ऐसी अवधि के पूरा होने के बाद, संतुष्ट है कि: i. बैंक द्वारा किए गए प्रलेखित संचार के कई प्रयासों के बावजूद न तो उधारकर्ता और न ही उसके लेखा परीक्षक/ निदेशक/ प्रवर्तक से संपर्क हो सका और न उन्होंने कोई प्रतिक्रिया दी; और ii. बैंक के पास उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार उधारकर्ता, पंजीकृत कार्यालय के पते पर कार्यरत नहीं पाया गया। (7) यदि कोई उधारकर्ता आहरण के बाद लापता हो जाता है, तो नामित एडी श्रेणी I बैंक इसकी सूचना रिज़र्व बैंक और प्रवर्तन निदेशालय दोनों को दें।“ (डा. आदित्य गेहा) फुट नोट: मूल विनियमावली सरकारी राजपत्र के असाधारण, भाग-II, खण्ड 3, उप-खण्ड (i) में दिनांक 17 दिसंबर 2018 को जी.एस.आर. सं. 1213(अ) के माध्यम से प्रकाशित की गयी थी और इसे बाद में निम्नानुसार संशोधन किए गए, अर्थात्; (i) 26 फरवरी 2019 को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना संख्या जी.एस.आर. सं.163(ई) (ii) 24 मई 2021 को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना सं. फेमा. 3(आर)(2)/2021-आरबी (iii) 28 जुलाई 2022 को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना सं. फेमा. 3(आर)(3)/2022-आरबी (iv) 9 अक्टूबर 2025 को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना सं. फेमा. 3(आर)(4)/2025-आरबी |
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